सोयाबीन की जगह अरहर फसल साबित हो सकता है बेहतर विकल्प

मौसम विभाग द्वारा इस वर्ष खरीफ में अच्छी वर्षा होने की संभावना जाहिर की गई है। जिसके कारण इस वर्ष जिले में कृषि रकबा में वृद्धि होने की संभावना है। कृषि विभाग द्वारा भी खरीफ में बेहतर खेती के लिये कार्य योजना तैयार कर लगातार कृषि आदान सामग्रियों (खाद एवं बीज) का सहकारी समितियों में लक्ष्य अनुसार भंडारण कराया जा रहा है। अनुमान अनुसार इस वर्ष 298520 हेक्टेयर धान का रकबा, सोयाबीन 34100 हेक्टेयर, अरहर 9650 हेक्टेयर, तिलहनी फसल 35390 हेक्टेयर तथा दलहनी फसल 19800 हेक्टेयर में लगने के अलावा 6020 हेक्टेयर में साग सब्जी फसले लगने की संभावना है।

सभी समितियों में धान, अरहर के बीज पर्याप्त मात्रा में भंडारित है, परन्तु पूर्व वर्ष की भांति इस वर्ष भी सोयाबीन के बीज की न्यूनता के कारण भंडारण में विलंब हो रहा है। ऐसे समय में जब खरीफ मौसम मुहाने पर है। खेती करने वाले किसानों को सोयाबीन के अलावा अन्य दलहन एवं तिलहन फसलों के विकल्प पर भी विचार करने की आवश्यकता है। सोयाबीन के स्थान पर अरहर फसल ऊपरी भूमि व भर्री भूमि वाले कृषक के लिये एक बेहतर विकल्प हो सकता है। क्योंकि अरहर के विभिन्न प्रकार के फसलों के साथ बुआई किये जा सकने एवं अतिरिक्त आमदनी का जरिया होने के कारण इस फसल को सोयाबीन के विकल्प के रूप में उपयोग किया जा सकता है। अरहर की बुआई का उपयुक्त समय 25 जून से 15 जुलाई तक रहता है जहां पानी की सुविधा है, वहां जल्दी बुआई करना लाभप्रद रहता है इसकी बुआई देरी की दशा में 5 अगस्त तक कर सकते हैं। अरहर के अनुशंसित किस्मों में प्रगति, प्रभात, मारूति, आशा, राजीव लोचन जैसे किस्में सूखा सहन, बांझपन निरोधक होने के साथ ही उकडा रोग निरोधक व फल्लीभेदक सहनशील इसमें है। जिसमें से प्रभात शीघ्र पकने वाली (130-135 दिन) इसमें समिति के अलावा एनएससी, कृषि विश्वविद्यालय आदि स्थानों पर उपलब्ध है।

अरहर के बुआई की विधियां –
अरहर को हमेशा पंक्तियों में बोना ही लाभप्रद होता है तथा मिश्रित फसल की दशा में अरहर को मूंग, मक्का, मुंगफली, उड़द, कोदो एवं रागी फसल के साथ इसकी सफल खेती की जा सकती है।

अरहर की रिज एंड फरो विधि –
वर्तमान में मॉदा एवं क्यारी विधि के द्वारा कृषक अरहर फसल से अधिक से अधिक उत्पादन प्राप्त कर रहे है। इस विधि में दो क्यारियों के बीज मांदा बनाकर पौधों को ऊंची उठी क्यारियों में लगाते है, जिससे कि अधिक वर्षा की स्थिति में पानी क्यारी से रिसकर मॉदा में इक्कट्टा हो जाता है, जिसे असानी से खेत से बाहर निकाला जा सकता है। साथ ही सूखा पडऩे की स्थिति में केवल मॉदा में पानी भर देने से वह धीरे-धीरे फसलों को सिंचाई उपलब्ध कराते रहता है, इस प्रकार दोनों स्थितियों में यह अरहर फसल को सुरक्षित रखता है।

धान के मेढ़ों पर अरहर –
धान के मेढ़ों पर अरहर के लिये 1 हेक्टेयर धनहा खेत के चारों तरफ मेढ़ों पर 2 किलो ग्राम बीज व 10 किलो ग्राम डीएपी उर्वरक पर्याप्त होता है।

सोयाबीन के साथ अरहर –
सोयाबीन के साथ अरहर लगाने के लिये सोयाबीन के 4 से 6 कतारों के बाद अरहर की 2 कतारे लगाये। ऐसा करने से सोयाबीन कटने के बाद अरहर से अतिरिक्त उपज प्राप्त होता है।

कोदो या रागी के साथ अरहर –
लघु धान्य फसलों के साथ अरहर की 3 से 4 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बीज मिलाकर छिड़काव विधि से बोया जा सकता है अथवा कोदो के 6 कतारों के बाद अरहर की भी दो कतार बोते हैं। उर्वरक मात्रा 10 से 20 किलो ग्राम नत्रजन, 20 किलो ग्राम सल्फर तथा 20 किलो ग्राम पोटाश की मात्रा देना चाहिए।

अपील –
उप संचालक कृषि जीएस धुर्वे ने आगामी खरीफ में सोयाबीन बीज के भंडारण में विलंब तथा अन्य राज्यों में बीज उपलब्ध न होने की स्थिति को देखते हुए किसानों को सोयाबीन के बेहतर विकल्प के रूप में अरहर फसल को अपनाने की अपील की है।