व्यापारिक दृष्टि से काफी फायदेमंद है जायफल की खेती…

जायफल की खेती व्यापारिक दृष्टिकोण से काफी फायदेमंद मानी जाती है। वैसे जायफल के बारे में कहा जाता है कि इसकी उत्पत्ति इंडोनेशिया के मोलुकास द्वीप में हुई है। लेकिन धीरे-धीरे भारत के साथ ही दूसरे देशों में भी इसकी खेती होने लगी है। क्योंकि जायफल से आचार, जैम, कैंडी, सुगंधित तेल, मसाले और औषधीय बनाए जाते हैं। इस हिसाब से जायफल की उपयोगिता काफी बढ़ गई है। तो आइए आज जानकारी लेते हैं जायफल की खेती के बारे में…

पौधा परिचय
मिरिस्टिका प्रजाति के वृक्ष पर लगने वाले फलों को जायफल कहा जाता है। इसके पौधे सामान्यत: 15 से 20 फीट ऊंचे होते हैं। पौधरोपण के बाद इसमें 6 साल के बाद फल लगने शुरू हो जाते हैं।

मिट्टी
जायफल की खेती के लिए गहरी और उपजाऊ भूमि उपयुक्त होती है। यदि आप पौधों का जल्द विकास चाहते हैं तो बलुई दोमट मिट्टी में इसके पौधों का रोपण कर सकते हैं। इसके साथ ही मिट्टी का पीएच मान सामान्य ही होना चाहिए।

जायफल की खेती जलवायु
जायफल उष्णकटिबंधीय जलवायु का पौधा है। इसलिए इसकी खेती के लिए ना तो ज्यादा गर्म और ना ज्यादा सर्द जलवायु होना चाहिए, बल्कि दोनों सामान्य रूप से होना चाहिए। याद रखें सर्दियों का पाला इसके लिए हानिकारक है। पौधों को विकसित होने के लिए सामान्य बारिश के साथ ही हल्की छाया की जरूरत होती है।

तापमान
जायफल के पौधों के अंकुरण के समय तापमान ज्यादा से ज्यादा 18 से 22 डिग्री और अंकुरित होने के बाद 28 से 30 डिग्री सेंटीग्रेट होना चाहिए। परिपक्व पौधे गर्मियों में अधिकतम 35 से 38 और सर्दियों में न्यूनतम 10-12 डिग्री के आसपास के तापमान पर अच्छे से विकसित हो जाते हैं।

किस्में
जायफल की कुछ प्रचलित उन्नत प्रजातियाँ आई.आई.एस.आर विश्व और केरलाश्री है।

भूमि की तैयारी
जायफल एक बहुवर्षीय पौधा है, यह कई सालों तक पैदावार देता है, इसलिए इसे लगाने से पहले भूमि की तैयारी अच्छे से कर लेनी चाहिए। भूमि में मौजूद पुराने अवशेषों को नष्ट करने के बाद हल से गहरी जुताई कर खुला छोड़ दें। इससे मिट्टी में मौजूद हानिकारक कीट शुरुआत में ही नष्ट हो जाते हैं। फिर दो-तीन जुताई कर भूमि को भुरभुरा बना लें। इसके बाद एक निश्चित दूरी में लाइन से गड्ढे बना लें। याद रखें गड्ढों से गड्ढों के बीत 20-22 फीट तो पंक्तियों के बीच की दूरी से 15 से 20 फीट रख सकते हैं।

जायफल की खेती पौधों की तैयारी
वैसे तो जायफल के पौधे बीज और कलम दोनों ही माध्यम से तैयार किए जा सकते हैं। लेकिन बीज के माध्यम से पौधा तैयार करने में नर और मादा पेड़ों के चयन में बहुत समस्या होती है। इसलिए कलम के जरिए यानी ग्राफ्ंिटग से पौधरोपण की तकनीक बेहतर मानी गई है।

रोपण का तरीका
इसके पौधों की रोपाई का सबसे उपयुक्त समय बारिश का मौसम होता है। अत: पौधों की रोपाई जून के मध्य से अगस्त माह के शुरुआत तक कर देनी चाहिए। पौधे लगाने से पहले बनाए हुए गड्ढों के बीच एक और छोटे आकार का गड्ढा बना कर इसे गड्डे को गोमूत्र या बाविस्टीन से उपचारित कर ले, ताकि पौधे शुरूआती दौर में किसी बीमारि से ग्रस्त ना हो। गड्डों को उपचारित करने के बाद पौधे उसमें लगा दें तथा पौधे के तने को दो सेंटीमीटर तक मिट्टी से दबा दें।

सिंचाई
जायफल की सिंचाई गर्मियों में 15-16 दिन के अंतराल में तो सर्दियों के मौसम में 25 दिनों के अंतराल में सिंचाई करते रहना चाहिए। बारिश के मौसम में पौधों को पानी की आवश्यकता नही होती।

खरपतवार से सुरक्षा
जायफल के पौधों की खरपतवार से सुरक्ष के लिए समय-समय पर निराई-गुड़ाई करते रहें तथा गुड़ाई और फल लगने के दौरान भी सिंचाई करें।