फसलों के अवशेष खेतों में ना जलाएं… मृदा स्वास्थ्य पर होता है विपरीत असर

कृषि विभाग द्वारा किसान भाईयों से अनुरोध किया है कि वे खरीफ फसलों की कटाई के उपरांत फसलों के अवशेषों (नरवाई) को खेतो में ना जलाए। आगामी फसल की बुवाई के लिए खेत को साफ करने के लिए फसल अवशेषों को जलाने से पर्यावरण प्रदूषण के साथ-साथ इसका विपरीत प्रभाव मृदा के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। साथ ही मृदा में उपलब्ध एन.पी.के. एंव सल्फर जैसे आवष्यक पोषक तत्वों का नुकसान होता है मृदा में पोषक तत्वों की कमी को पूरा करने के लिए किसान भाईयों की उत्पादन लागत में भी वृद्धि होती है।

फसल की कटाई के बाद खेत में बचे अवशेष घांस-फूस पत्तियां व ठूठ आदि को खेत में सड़ाने के लिये किसान भाई फसल को काटने के पश्चात 20-25 किग्रा नाइट्रोजन प्रति हैक्टर की दर से छिड़काव कर कल्टीवेटर या रोटावेटर से काटकर मृदा में मिला देना चाहिये। इस प्रकार अवशेष खेत में विघटित होना प्रारम्भ कर देगा तथा लगभग एक माह में स्वयं सड़कर आगे बोई जाने वाली फसल को पोषक तत्व प्रदान कर देगा, क्योकि कटाई के पश्चात दी गई नाइट्रोजन  अवशेषों में सडऩ की क्रिया को तेज कर देता है। फसल के अवशेषों को बारीक टुकडों में काटकर मृदा में मिला देना चाहिए, इस कार्य के लिये किसान भाई रोटावेटर जैसी मशीन का उपयोग कर सकते है।

फसल अवशेषों को खेत में जलाने को 1981 के वायु अधिनियम, आपराधिक प्रक्रिया संहिता 1973 और विभिन्न उपयुक्त अधिनियमों के तहत एक अपराध के रूप में अधिसूचित किया गया है। अत: किसान भाईयों से अनुरोध हे कि फसलों के अवषेषों (नरवाई) को खेतो में ना जलाए।