धान की फसलों को रोगों से बचाना बेहद जरूरी

बरसात के मौसम के साथ ही पूरे देश में बड़ी संख्या में धान के फसलों की बुआई शुरू हो जाती है। इस दौरान बोआई के साथ ही जैसे-जैसे फसलें धीरे-धीरे बढ़ती जाती हैं, तो इसमें उर्वरक और सिंचाई के लिए पर्याप्त ध्यान देना होता है। इसके साथ ही धान की फसलों में कई प्रकार के रोग भी लग जाते हैं, जिसके लिए किसान लगातार चिंतित रहते हैं। तो ऐसे रोगों से बचाव के लिए आपको कृषि वैज्ञानिकों से सतत संपर्क बनाए रखना चाहिए, ताकि उनकी सलाह से फसलों को कोई नुकसान न हो।

वैसे आपको बता दें कि धान में लगने वाले प्रमुख रोगों में दीमक भी एक है। इसलिए फसल से पहले गहरी जुताई करनी चाहिए। इसके साथ ही किसी प्रकार के कच्चे गोबर का प्रयोग नहीं करना चाहिए। यदि फसल लगाने से पूर्व किसी प्रकार का अवशेष शेष है, तो उसे अवश्य नष्ट कर देना चाहिए। साथ ही फसल लगाने से पहले मिट्टी को अच्छी तरह संतुलित करना चाहिए।

धान की फसल में लगने वाला एक और रोग खैरा है। कहा जाता है कि यह रोग जिंक की कमी के चलते होता है। इससे पत्तियां पीली पड़ जाती हैं।

इसी तरह धान की फसल में झोंका रोग भी लगता है। इसके लिए किसानों को लगातार फसलों की देखरेख की सलाह दी जाती है। धान की फसल पर ही भूरा धब्बा रोग भी लगता है। इसलिए इससे बचाव के लिए खेत के आस-पास के क्षेत्र को खरपतवार से यथा सम्भव मुक्त रखना चाहिए। उर्वरकों का संतुलित प्रयोग करना चाहिए। समय से बुवाई एवं फसल चक्र अपनाना चाहिए।

वहीं धान की फसल पर पत्ती लपेटक कीट का प्रभाव भी देखा जाता है। जब धान की फसल पकने की अवस्था में आती है, तो प्राय: इसका प्रकोप देखा जाता है। इसलिए धान की फसल को इन रोगों से बचाना बेहद जरूरी है। अन्यथा फसल उत्पादन पर इसका प्रभाव पड़ता है और उत्पादन में कमी आने के साथ-साथ क्वालिटी में भी फर्क आता है