किसानों के लिए वरदान है गेंदा फूल की खेती…

फूलों की मांग हर मौसम में बनी रहती है। लेकिन इसमें भी यदि गेंदा फूल की बात करें तो यह किसानों के लिए वरदान है। क्योंकि फूलों का हार हो या सजावट की बात, गेंदा फूल ही बहुतायत में दिखाई देते हैं। और इसकी खेती भी किसानों को मुनाफा ही मुनाफा देती है। एक बीघा में एक हजार से डेढ़ हजार रुपये की लागत लगती है। जबकी पैदावार 3 क्विंटल तक लिया जा सकता है। बाज़ार में इसकी क़ीमत 70 से 100 रुपए प्रति किलो है। तो चलिए आज हम बात करते हैं गेंदा फूल की व्यापारिक खेती के बारे में, लेकिन इससे पहले आपको बता दें कि  गेंदा की कुछ प्रजातियां जैसे- हजारा तथा पांवर प्रजातियां पूरे वर्ष भर फुल देती हैं। इसलिए यह व्यापारिक खेती की दृष्टि से काफी फायदेमंद है। इतना ही नहीं कम लागत में यदि ज्यादा मुनाफे की चाहत हो तो इन दो प्रजातियों की खेती आप आसानी से कर सकते हैं। क्योंकि इसके पौधे ढाई से तीन महीने में ही फूल देने शुरू हो जाते हैं। और सालभर में आप इसकी दो बार खेती कर सकते हैं। हैं ना मुनाफा ही मुनाफा…
जलवायु
जैसा कि आपको पहले ही बताया जा चुका है कि गेंदा फूल की खेती सालभर ली जा सकती है, तो जाहिर सी बात है कि मौसम चाहे कोई भी हो, इसकी खेती की जा सकती है। लेकिन कुछ ही प्रजातियों की। जलवायु की भिन्नता के अनुसार भारत में इसकी बुआई अलग-अलग समय पर होती है। उत्तर भारत में इसे दो समय पर बीज बोया जाता है पहली बार मार्च से जून तक और दूसरी बार अगस्त से सितम्बर। लेकिन शरद ऋतु में खेती के लिए उपयुक्त समय होता है। लेकिन ध्यान रखें कि गेंदा फूल पाले को सहन नहीं कर पाता है, इसलिए ऐसे क्षेत्रों में शरद ऋतु में इसकी खेती करने से बचना चाहिए। वहीं उत्तर भारत में मैदानी क्षेत्रो में इसे शरद ऋतु में तथा उत्तर भारत के ही पहाड़ी क्षेत्रो में गर्मियों में इसकी खेती की जाती है।
मिट्टी
गेंदा फूल की खेती वैसे तो किसी भी प्रकार की मिट्टी में की जा सकती है। लेकिन बलुई दोमट मिट्टी इसके लिए काफी अच्छी होती है। इस मिट्टी में पौधे लगाने से उत्पादन भरपूर मिलता है, ेलेकिन ध्यान रखें कि मिट्टी का पीएच मान 7.0 से 7.5 के बीच होना चाहिए।
खेत की तैयारी
गेंदा फूल की खेती के लिए पहले बीज ाके पौधशाला में उगाया जाता है। इसके लिए इसमें गोबर खाद डालकर जुताई अवश्य करना चाहिए। इसके बाद मिट्टी को भुरभुरा बनाने के लिए थोड़ा सा रेत मिला दें। जब पौध शाला में पौधे तैयार हो जाएं यानी पौधे 7 से 10 सेंटीमीटर तक बड़े जाएं तो इसके खेतों क्यारियां बनाकर लगा देनी चाहिए।
मात्रा
गेंदा फूल के लिए चयनित किस्मों का चयन कर बीज लगाने चाहिए। यानी यदि संकर किस्मों के बीज का रोपण करना है तो 800 ग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से तथा सामान्य किस्मों को 1.5 किलो्राम प्रति हेक्टेयर की दर से रोपण करना चाहिए।

सिंचाई
वैसे तो गेंदा फूल की खेती शरद ऋतु मे की जाती है, इसलिए इसमें ज्यादा सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती, लेकिन याद रखें की मिट्टी में नमी की मात्रा होना जरूरी है, नहीं तो फसल सूखने का खतरा रहता है। इसलिए इसकी सिंचाई हफ्त में दो से तीन बार अवश्य करें।
गेंदा फूल की किस्में
गेंदा फूल की चार किस्मों की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है। इसमें अफ्रीकन गेंदा, मैक्सन गेंदा, फ्रेंच गेंदा और संकर किस्म के गेंदा नगेटरेटा, सौफरेड, पूसा नारंगी गेंदा, पूसा बसन्ती गेंदा आदि शामिल हैं।
खाद
गेंदा फूल की खेती के लिए 200 से 200 क्विंटल प्रति हेक्टेयर के मान से गोबर खाद खेत की तैयारी के समय ही डाल देना चाहिए। इसके साथ ही 120 किलोग्राम नत्रजन, 80 किलोग्राम फास्फोरस तथा 80 किलोग्राम पोटाश तत्व के रूप में प्रति हेक्टेयर सही है।
खरपतवार से नियंत्रण
किसी भी फसल या फूलों की खरपतवार से सुरक्षा करना बहुत जरूरी होती है। नहीं तो फसलों को काफी नुकसान हो सकता है। इसलिए गेंदा फूल को खरपतवारों से साफ-सुथरा रखना अनिवार्य है। समय-समय पर खरपतवार को हटाते रहें और निंदाई करते रहे।
कीट नियंत्रण
गेंदा में मुख्य रूप से अर्द्धतन, खर्रा, विषाणु रोग तथा मृदु गलन रोग लगते हैं। इसलिए इसके उपचार के लिए लगातार उपाय करते रहना चाहिए, नहीं तो नुकसान हो सकता है। खर्रा रोग के नियंत्रण हेतु किसी भी फफूंदी नाशक का छिड़काव 15-20 दिनों के अंतराल पर करते रहें। वहीं गलन रोग के नियंत्रण लिए मिथायल ओ डिमेटान 2 मिली लीटर या डाई मिथोएट 10 मिली लीटर प्रति 10 लीटर पानी के हिसाब से छिड़काव करना चाहिए। वहीं कलिका भेदक, थ्रिप्स एवं पर्ण फुदका कीट के नियंत्रण के लिए फास्फोमिडान / डाइमेथोएट 0.05 प्रतिशत के घोल का छिड़काव 10 से 15 दिन के अंतराल पर दो-तीन छिड़काव करना चाहिए।
तुड़ाई का समय
गेंदा फूल की तुड़ाई हमेशा सुबह के समय ही करना चाहिए। तेज धूप में फूल खराब होने का खतरा बना रहता है।  कटे फूलो को अधिक समय तक रखने हेतु 8 डिग्री सेंटीग्रेट तापमान पर तथा 80 प्रतिशत आद्रता रखें।