आयुर्वेदिक गुणों से भरपूर बेल की खेती…

बेल में आयुर्वेदिक गुण भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। इसलिए इसके फायदे भी कई हैं। जिसके चलते इसका उपयोग औषधि निर्माण में किया जाता है। वहीं कफ-वात विकार, बदहजमी, दस्त, मूत्र रोग, पेचिश, डायबिटीज, ल्यूकोरिया में बेल के फायदे ले सकते हैं। इसके अलावा पेट दर्द, ह्रदय विकार, पीलिया, बुखरा, आंखों के रोग आदि में भी बेल के सेवन से लाभ मिलता है। तो आइए आज हम जानकारी लेते हैं बेल की खेती के बारे में…

जलवायु
बेल उपोष्ण जलवायु का पौधा है। इसलिए इसकी खेती के लिए 1200 मीटर ऊंचाई और 7 से 46 डिग्री सेल्सियस तापमान पर भी इसकी खेती आसानी से की जा सकती है।

मिट्टी
वैसे तो बेल को किसी भी प्रकार की मिट्टी में आसानी से उगाया जा सकता है, लेकिन यदि बलुई दोमट मिट्टी हो तो ज्यादा अच्छा रहता है। इसके साथ ही ऊसर, बंजर, कंकरीली, खादर, बीहड़ भूमि में इसे आसानी से उगाया जा सकता है।

किस्में…
बेल की कई किस्में इन दिनों बाजार में आने लगी हैं। लेकिन यदि आप इसकी पुरानी किस्मों की खेती करना चाहते हैं तो आपके लिए सिवान, देवरिया, बड़ा कागजी, इटावा, चकिया, मिर्जापुरी, कागजी गोण्डा आदि उपयुक्त रहेगा। वहीं यदि नवीनतम किस्म की बात करें तो नरेंद्र बेल- 5, पंत शिवानी, पंत अर्पणा, पंत उर्वशी, पंत सुजाता, सी. आई. एस . बी. 1, सी. आई. एस. एच. बी. 2 आदि बेहतर है।

बोआई
बेल के पौधे बीज से ही तैयार होते हैं। इसलिए बीजों की बोआई भी फलों से निकालने के तुरंत बाद की कर दी जाती है। इसके पौधों का रोपण आप 5 से अधिकतम 9 मीटर की दूरी पर लगा सकते हैं। पौधरोपण के लिए जुलाई-अगस्त का महीना अच्छा पाया गया है। इसके पौधरोपण के लिए पहले एक निश्चित अनुपात में गड्ढे तैयार कर ले। फिर उसे महीनेभर तक खुले छोड़कर उसमें गोबर की खाद और मिट्टी मिलाकर भर दें। इन्हीं तैयार गड्ढों में जुलाई-अगस्त में पौध रोपण करें। पौधे लगाने के बाद हल्की सिंचाई करें, उपयुक्त होता है।

खाद एवं सिंचाई
बेल पौधों की अच्छी बढ़वार के लिए उचित मात्रा में खाद एवं उर्वरक आवश्यक है। इसके लिए प्रति पौधा 5 किलोग्राम गोबर की सड़ी खाद, 50 ग्राम नाइट्रोजन, 25 ग्राम फ़ॉस्फोरस और 50 ग्राम पोटाश की मात्रा प्रति वर्ष प्रति पेड़ में डालें। बेल के पौधों को शुरूआत में सिंचाई की बहुत जरूरत होती है। इसके बाद क्रमश: धीरे-धीरे कम होती जाती है।

रोग एवं कीट नियंत्रण
बेल में कैंकर रोग जैन्थोमोनस विल्वी बैक्टीरिया से होता है। इसकी रोकथाम के लिए स्ट्रेप्टोसाइक्लिन सल्फेट पानी में घोल कर 15 दिनों के अंतराल पर छिड़कते रहें। इसके अलावा  फ्यूजेरियमनामक फफूंद के प्रकोप से छोटे फल गिरने लगते हैं। इसके नियंत्रण के लिए  कार्बेन्डाजिम का दो छिड़काव 15 दिनों के अंतराल पर करें। साथ ही डाई बैक से भी नुकसान होता है, इसके नियंत्रण के लिए कॉपर ऑक्सीक्लोराइड का दो छिड़काव सूखी टहनियों को छांट कर 15 दिनों के अंतराल पर करना चाहिए। वहीं बेल को कीट ज्यादा नुकसान नहीं पहुंचाते हैं। फिर भी इसमें पर्ण सुरर्गी और पर्ण भक्षी झल्ली कीट लगने का खतरा रहता है, इसकी रोकथाम के लिए थायोडॉन का छिड़काव सप्ताह के अंतराल पर करना चाहिए।

तुड़ाई
कलमी पौधों में 3-4 वर्षों में फल प्रारंभ हो जाती है, जबकि बीजू पेड़ 7-8 वर्ष में फल देते हैं। अप्रैल-मई में तोडऩे योग्य हो जाते हैं। ध्यान रखें जैसे-जैसे वृक्ष का आकार बढ़ते जाता है, वैसे-वैसे फलों की संख्या भी बढ़ती जाती है।

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